Wednesday, April 30, 2014

3डी टीवी में जुड़ी एक और अनोखी तकनीक

3डी टीवी में जुड़ी एक और अनोखी तकनीक 

 

3डी फिल्मों के बाद अब 3डी यानी त्रिआयामी टीवी सैट बाज़ार में उपलब्ध हो चुके हैं और कुछ 3डी चैनल [जैसे कि डिस्कवरी 3डी और नेट जीयो 3डी] प्रसारण शुरू करने की तैयारी में है. पश्चिमी देशों में यह तकनीक और 3डी टीवी चैनल पहले से ही उपलब्ध है. अब इस माध्यम को गेमिंग के साथ जोड़कर इसे एक नया आयाम देने का प्रयास किया गया है.

जापान के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रीयल साइंस एंड टेक्नोलोजी के वैज्ञानिकों ने i3Space तकनीक विकसित की है. इस तकनीक की मदद से कोई भी व्यक्ति टीवी पर प्रसारित हो रही 3डी छवियों को अपनी उंगलियों के इशारों पर तोड़मरोड़ सकता है, उन्हें दबा सकता है और खींच सकता है.

कैसे काम करती है यह तकनीक?
इस तकनीक में एक विशेष 3डी टीवी सैट और 6 मोशन डिटेक्टर कैमेरा एक साथ काम करते हैं. ये कैमेरा दर्शक की उंगलियों पर नज़र रखते हैं. दर्शक अपनी तर्जनी उंगली पर एक क्लिप पहनते हैं. इसके बाद जब भी वे किसी दृश्य के पास अपनी उंगली ले जाते हैं तो वांछित नजदीकी प्राप्त होते ही वह क्लिप कम्पन करने लगती है. इससे दर्शक जान जाते हैं कि उनकी उंगली अब उस दृश्य [दृश्य में दिखाई जा रही छवि] को छू रही है. इसके बाद वे अपनी उंगली हिलाते हैं तो उस हिसाब से वह छवि अपना आकार बदलने लगती है.

इस तकनीक को विकसित करने वाले संस्थान के प्रवक्ता ने कहा कि - ऐसा पहली बार हुआ है जब आप हवा में तैर रही छवियों [आभासी] को छू पा रहे हैं. यह तकनीक आभासी वातावरण को और भी अधिक वास्तविक बनाती है. अब आप इन आभासी तस्वीरों को महसूस कर सकते हैं और उन्हें हिला-डुला और तोड़ मरोड भी सकते हैं.

कहाँ काम आएगी यह तकनीक?
यह तकनीक गेमिंग के क्षैत्र में काफी उपयोगी साबित हो सकती है. यह तकनीक जायरोक्यूबसेंसुअस इंटरफेस पर आधारित है जिसे इस संस्थान ने 2005 में विकसित किया था.

माइक्रोसोफ्ट की नई टचस्क्रीन तकनीक

माइक्रोसोफ्ट की नई टचस्क्रीन तकनीक 

 

माइक्रोसोफ्ट ने एक नई तकनीक विकसित की है जिसकी मदद से प्रयोक्ता डिवाइज की स्क्रीन पर दिख रहे चित्रों पर प्रदर्शित टेक्ष्चर, उभार और खुरदुरी सतह को महसूस कर पाएंगे.

यदि यह तकनीक लोकप्रिय होती है और परीक्षणों में सफल रहती है तो इसका इस्तेमाल मोबाइल फोनों में भी होने लगेगा और एक दिन कीपैड वाले मोबाइल फोन भूतकाल की बात हो जाएंगे. क्योंकि तब स्क्रीन पर ही उभरने वाले कीपैड का इस्तेमाल करना एकदम सरल हो जाएगा.

परंतु माइक्रोसोफ्ट ने इस तकनीक को फिलहाल अपने टेबल डिवाइज़ सर्फेस के लिए तैयार किया है. सर्फेस एक बडा कम्यूटिंग डिवाइज़ है जो टेबलनुमा है. टेबल की सतह पर स्क्रीन लगी होती है और नीचे रखा एक प्रोजेक्टर तस्वीरों को प्रोजेक्ट करता है. वहीं पर लगे कैमरे प्रयोक्ता की उंगलियों के क्षैत्र को इंफ्रारेड तकनीक के माध्यम से चिह्नित करते हैं और इस तरह से टचस्क्रीन सुविधा प्रदान की जाती है.

अब सर्फेस प्रयोक्ता स्क्रीन के ऊपर दिख रहे चित्रों को ना केवल देख पाएंगे बल्कि महसूस भी कर पाएंगे. माइक्रोसोफ्ट ने जिस तकनीक को पेटेंट करवाया है उसमें पिक्सल साइज़ के पोलिमर लगाए गए हैं, जो पराबैंगनी किरणों की तरंगों के हिसाब से खुद को कठोर या मुलायम बनाएंगे. इससे सतह के टेक्ष्चर को महसूस किया जा सकेगा.

इससे कम्प्यूटिंग और भी सरल और वास्तविक बन जाएगी.

अमीर बनना है? आपकी गणित कैसी है?

अमीर बनना है? आपकी गणित कैसी है? 

 

क्या आप अंकों के खेल में अच्छे हैं? क्या आप गणनाएँ करने में तेज हैं? यदि हाँ तो बहुत सम्भावना है कि आप अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक आमदनी करते होंगे. और यदि आपकी पत्नी भी अंकों की गणनाओं में तेज हैं तो आपके अमीर होने की सम्भावना और भी बढ जाती है.

एक नई शोध के अनुसार जो युगल अंकों की गणनाओं में तेज होते हैं वे अपने जीवन के मध्यकाल में अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक कमाई करते हैं. रैंड कोर्पोरेशन जो कि एक गैर व्यवसायी शोध संस्थान है कि लेबर मार्केटस एंड डेमोग्राफी स्टडीज़ के अनुसार अंकों की गणनाओं में निपुण लोग अधिक पैसा कमाते हैं. इस शोध के लिए कुछ युगलों से अंकों पर आधारित सवाल पूछे गए और उनकी आमदनी की जानकारियाँ ली गई.

इस अभ्यास से पता चला कि जो युगल अंकों की गणनाओं में तेज थे उनकी आय अनुपात में 17 लाख डॉलर सालाना थी, परंतु जो लोग अंकों की गणनाओं में कमजोर थे उनकी सालाना आय मुश्किल से 2 लाख डॉलर ही थी.

शोधकर्ताओं के अनुसार अंकों की गणनाओं में निपुण व्यक्ति यदि घर के वित्तीय निर्णय लेता है तो ऐसे निर्णय आम तौर पर सही होते हैं और उनसे लाभ अर्जित होता है. परंतु गणित में कमजोर व्यक्ति लाभ और हानि का हिसाब ठीक से नहीं लगा पाते हैं और वित्तीय निर्णय लेने में भी झिझक महसूस करते हैं. इसलिए वे पैसे कमाने के कई मौके खो देते हैं.

अंकों की गणनाएँ बचपन में विद्यालयों में सिखी जाती हैं, परंतु कुछ लोगों में यह क्षमता नैसर्गिक रूप से बेहतर होती है. यह एक ऐसी कला है जो सिखी तो जा सकती है परंतु इसमें पारंगत होना नैसर्गिक रूप से निर्भर करता है.

Monday, April 28, 2014

मीटर गैज और ब्रोड गैज की रोचक कहानी

मीटर गैज और ब्रोड गैज की रोचक कहानी 

 

भारत में आज भी रेलगाडियाँ कई अलग अलग माप के ट्रेक पर चलती है - जैसे कि ब्रोड गैज, मीटर गैज, नैरो गैज आदि.. परंतु सर्वमान्य ट्रेक अब ब्रोड गैज हो गया है. कई अन्य तकनीकों की तरह भारत का रेलवे सिस्टम भी अंग्रेजो के द्वारा ही विकसित किया गया था और उस जमाने के हिसाब से उसे मान्यता दी गई थी. तो फिर ब्रोड गैज और मीटर गैज के माप किस तरह से तय किए गए? आइए जानते हैं -

मीटर गैज -

1869 में लोर्ड मेयो ने जो कि भारत के वायसरॉय थे, एक फरमान जारी किया था कि भारत में भी रेलवे सिस्टम होना चाहिए और ट्रेन के डिब्बे में 4 व्यक्ति आराम से बैठ सकें इसलिए उसकी चौड़ाई 6 फूट 6 इंच होनी चाहिए. ट्रेन के ट्रेक का माप उसके 50% से कम नहीं होना चाहिए यानी कि 3 फूट 3 इंच. इसको मिलीमीटर में बदलने पर माप आता है 990 मिमी.

अंग्रेज उस समय भारत में मैट्रिक पद्धति ला रहे थे, इसलिए उन्होनें ट्रेक का माप सुविधा के लिए 1000 मिमी. यानी 1 मीटर कर दिया और इस तरह बना मीटर गैज ट्रेक का माप. भारत ने भी 1957 में माप की मैट्रिक प्रणाली को अपना लिया. भारत में आज 11,000 किमी से अधिक के ट्रेक मीटर गैज ही हैं.

ब्रोड गैज -

भारत में ब्रोड गैज ट्रेक का माप 5.5 फूट का होता है परंतु इंग्लैंड में जो स्टैंडर्ड गैज अपनाया गया था उसके ट्रेक का माप थोडा विचित्र यानी कि 4 फूट 8.5 इंच था. प्रश्न यह है कि इंग्लैंड ने इतने अटपटे माप को क्यों अपनाया? इसका जवाब इतिहास मे मिलता है. रोमन लोग अपने रथों के पहियों के बीच की दूरी को 4 फूट 8.5 इंच पर ही रखते थे, क्योंकि दो घोडों को आपस में टकराए बिना एक साथ दौडते रहने के लिए एक दूसरे से कम से कम इतना दूर होना जरूरी होता है.

रोमनों ने जब इंग्लैंड पर कब्जा किया तो उन्होनें वहाँ के मार्गों पर भी अपने रथ दौड़ाए. समय बीतने पर अंग्रेजों ने उसी माप की बग्गी बनाई और वर्षों तक उसका इस्तेमाल किया. इसके बाद पहले वाष्प इंजिन को जब बनाया गया तो उसका माप भी यही था. अंत में ज्योर्ज स्टीफंस ने पहला रेल इंजिन रॉकेट बनाया और उसकी चौड़ाई भी यही थी.

वर्ष 2010 की 7 सबसे बडी पुरातत्व खोजें

वर्ष 2010 की 7 सबसे बडी पुरातत्व खोजें 

 

अपने पूर्वजों और अपने इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त करने की उत्सुकता हमें विरासत में मिली है और इससे हमारे आज के जीवन का भी विकास हुआ है. दुनिया में पुरातत्व के क्षैत्र में नित नई खोजें होती रहती है. आर्कियोलोजी पत्रिका ने वर्ष 2010 में हुई सबसे बडी पुरातत्व खोजों की सूचि जारी की है. इस सूचि पर नजर डालें तो पता चलता है कि ये खोजें मात्र जमीन और पानी के भीतर ही नहीं बल्कि लेबोरेटरी में भी की गई थी.

इस पत्रिका के अनुसार इस वर्ष हुई सबसे बडी पुरातत्व खोज ग्वाटेमाला की शाही कब्र है. इसके अलावा लेबोरेटरी में की गई रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक के नए परीक्षणों को भी इस सूचि में स्थान मिला है. इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक अवशेषों को किसी भी प्रकार का नुकसान पहुँचाए बिना उनके जीवन में आने की तिथि का पता लगा सकते हैं.

बहरहाल यह हैं वर्ष 2010 में हुई पुरातत्व विज्ञान से संबंधित 7 सबसे बडी खोजें
-

  • 1. हेक्टोम्नस की कब्र, तुर्की
  • 2. पेलियोलिथिक उपकरण, प्लाकियास क्रेक
  • 3. शाही कब्र, ग्वाटेमाला
  • 4. शुरूआती पिरामीड, पेरू
  • 5. एचएमएस खोजी जहाज, कनाडा
  • 6. नींदरथल जीनोम की डिकोडिंग, जर्मनी
  • 7. बच्चों की हत्या के प्रमाण, ट्युनिशिया

 

7 वेबसाइटें जिनसे दुनिया बदल गई!

7 वेबसाइटें जिनसे दुनिया बदल गई! 

 

ये वे वेबसाइटें हैं जिनके बिना आज इंटरनेट और जीवन की कल्पना करना मुश्किल है. जिस किसी व्यक्ति ने एक बार भी इंटरनेट का इस्तेमाल किया होगा उसने इन सभी अथवा इनमें से अधिकतर साइटों को ब्राउज़ किया ही होगा. ये वे साइटें हैं जो अपने आप में एक मिसाल हैं -



विकीपीडिया

जानकारी प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है विकीपीडिया. आज किसी भी विषय पर आधारित खोज कीजिए और पहला लिंक आपको विकीपीडिया का ही मिलेगा. विकीपीडिया के आगमन से पहले भी ओनलाइन इंसिक्लोपीडिया तो कई थे, लेकिन उन सभी में कम ही जानकारियाँ होती थी और उनका इस्तेमाल कठीन था.

लेकिन विकीपीडिया के आगमन के साथ ही पूरी परिस्थिति बदल गई. विकीपीडिया एक मुक्त ज्ञानकोष है. इसे कोई भी व्यक्ति सम्पादित कर सकता है और लाखों स्वयंसेवकों की वजह से हर दिन इसका ज्ञानकोष का कद कई गुना बढ रहा है.

आज यह ज्ञानकोष मात्र अंग्रेजी ही नहीं लगभग हर भारतीय तथा अन्य वैश्विक भाषाओं में उपलब्ध है.

शुरूआत : 15 जनवरी 2001
निर्माता : जिम्मी वालेस, लैरी सैंगर
भाषाएँ : 240



हॉटमेल

आज की नई पिढी शायद इस नाम को ना पहचाने या पहचाने भी तो ध्यान ना दे, परंतु हॉटमेल ने किसी समय ईमेल की परिभाषा को ही बदल दिया था. हॉटमेल से पहले ईमेल करना और ईमेल प्राप्त करना दुरूह कार्य होता था. ओनलाइन ईमेल क्लाइंट सोफ्टवेर उपलब्ध नहीं था. आप जब ईमेल को अपने एक पीसी पर डाउनलोड करते तो रिमोट सर्वर से वह डिलिट हो जाता. यानी कि एक ईमेल एक ही स्थान पर देखा जा सकता था.

हॉटमेल ने वेबमेल की शुरूआत की. हॉटमेल को किसी भी पीसी से ब्राउज़ किया जा सकता था. किसी मेल को कितनी भी बार किसी भी स्थान से खोला जा सकता था. शब्बीर भाटिया और कुछ अन्य लोगों की इस खोज ने ईमेल करने के तौर तरीकों को बदल दिया. बाद में माइक्रोसोफ्ट ने हॉटमेल को खरीद लिया और अब यह ब्रांड समाप्त हो चुका है और उसकी जगह माइक्रोसोफ्ट लाइव मेल ने ले ली है. लेकिन हॉटमेल को लोग आज भे याद करते हैं.

शुरूआत : 4 जुलाई, 1996
निर्माता : शब्बीर भाटिया तथा अन्य

अधिग्रहण : माइक्रोसोफ्ट


फेसबुक

फेसबुक विश्व की सबसे लोकप्रिय सोश्यल नेटवर्किंग साइट है. अमेरिका जैसे देश में तो इसने गूगल को भी पीछे छोड़कर सबसे लोकप्रिय साइट होने का गौरव भी प्राप्त कर लिया है. फेसबुक के प्रयोक्ता करोड़ों में हैं और कई लोगों का तो दिन और रात फेसबुक पर ही बीतता है.

लेकिन फेसबुक पहली सोश्यल नेटवर्किंग साइट नहीं थी. लेकिन इसने सोश्यल नेटवर्किंग के सिद्धांत को बदला. फेसबुक ने थर्ड पार्टी अप्लिकेशनों को मंजूरी देकर अपनी लोकप्रियता में तेजी से बढोत्तरी की. फेसबुक लोकप्रिय बना रहा क्योंकि उसने खुद को समय के हिसाब से बदला.

शुरूआत : 4 फरवरी, 2004
निर्माता : मार्क ज़करबर्ग



ट्विटर
क्या राजनेता, क्या अभिनेता, क्या समाज सेवक, क्या धर्म गुरू, क्या आम नागरिक. आज हर कोई ट्विटर पर मौजूद है. 140 अक्षरों के साथ आप दुनिया भर से जुड जाते हैं. क्या कुछ साल पहले तक कोई कल्पना कर सकता था कि एक सामान्य व्यक्ति बिल गेट्स, प्रियंका चोपड़ा, शशि थरूर आदि कई नामी गिरामी हस्तियों से सीधे सवाल पूछ सकता है और उसे अमूमन जवाब भी मिलता है!

यह ट्विटर का कमाल है, जिसने आम और खास का भेद मिटा दिया है. अब हर “खास” आदमी ट्विटर के माध्यम से आम दुनिया से जुडना चाहता है. दुनिया भर की सरकारें इस सेवा से डरने लगी है क्योंकि सूचना का अति तेज माध्यम पल भर में पल पल की खबर दुनिया के कोने कोने में पहुँचा रहा है.

ट्विटर आज जीवन का एक हिस्सा बन गया है.

शुरूआत : 2006
निर्माता : जैक डोर्सी, इवान विलियम्स, बिज़ स्टोन



यूट्यूब

यूट्यूब ने मनोरंजन के मायने बदल दिए. यूट्यूब से पहले ओनलाइन वीडियो देखने का कोई अच्छा माध्यम नहीं था. यूट्यूब की शुरूआत जब हुई तब भारत में काफी कम बैंडविथ ही उपलब्ध थी और लोग सोचते थे कि यह साइट नहीं चलेगी, क्योंकि भारी भरकम वीडियो लोग देखेंगे कैसे? लोग अपनी साइटों पर वीडियो अपलोड नहीं करते थे, क्योंकि इससे उनका बैंडविथ खर्च अतिशय बढ जाता.

लेकिन यूट्यूब के आगमन के साथ ही परिस्थिति बदल गई. यूट्यूब ने लोगों को चौंका दिया. अब मुफ्त में वीडियो अपलोड किए जा सकते थे और उन्हें किसी भी साइट पर लगाया भी जा सकता था.

आज गूगल द्वारा अधिग्रहित कर ली गई इस सेवा पर हजारों वीडियो रोजाना अपलोड होते हैं और लाखों लोग उन्हें देखते हैं.

शुरूआत : फरवरी 2005
निर्माता : चाड हर्ली, जावेद करीम, स्टीव चैन
अधिग्रहण : गूगल (2006)



गूगल

नाम ही काफी है. इंटरनेट की सामान्य सी समझ रखने वाला शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जिसे गूगल के बारे में पता नहीं होगा. गूगल यानी खोज, खोज यानी गूगल. लोग यही तो कहते हैं- अच्छा फँलानी जानकारी चाहिए? गूगल कर लो ना!

आज इंटरनेट पर चाहे जो करते हों, एक ना एक बार गूगल पर जरूर जाते होंगे. गूगल पर खोज ना भी करें तो उसकी असंख्य मुफ्त सेवाओं का इस्तेमाल तो करते ही होंगे. जीमेल है, रीडर है, ब्लॉग स्पोट है, पिकासा है, यूट्यूब है... सूचि लम्बी है. सोचिए!

शुरूआत : 4 सितम्बर 1998
निर्माता : सर्जेई ब्रिन, लॉरेंस पैज



एमेज़न

खरीददारी ऐसे भी हो सकती है! बिना दुकान में जाए, घर बैठे. बस लोगिन कीजिए, अपनी पसंद का उत्पाद चुनिए, क्रेडिट कार्ड से भुगतान कीजिए और हो गया! घर बैठे आपको अपना सामान मिल जाएगा. एमेज़न ने लोगों की खरीददारी की आदत को बदल दिया. आज इंटरनेट पर असंख्य ओनलाइन शोपिंग साइटें है. लेकिन इस उद्योग की नीवं एमेजन ने रखी थी.

शुरूआत : 1994
निर्माता : जैफरी बिज़ोज

 

26 जनवरी की कहानी, गणतंत्र दिवस कभी ‘स्वतंत्रता दिवस’ भी था

26 जनवरी की कहानी, गणतंत्र दिवस कभी ‘स्वतंत्रता दिवस’ भी था 

 

 

26 जनवरी भारत का गणतंत्र दिवस है. सन 1950 में इसी दिन देश के संविधान को लागू किया गया था. तब से आज तक इस दिन को देश गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाता है.      

211 विद्वानों द्वारा 2 महिने और 11 दिन में तैयार भारत के सँविधान को लागू किए जाने से पहले भी 26 जनवरी का बहुत महत्व था. 26 जनवरी एक विशेष दिन के रूप में चिह्नित किया गया था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1930 के लाहौर अधिवेशन में पहली बार तिरंगे झंडे को फहराया गया था परंतु साथ साथ ही एक और महत्वपूर्ण फैसला इस अधिवेशन के दौरान लिया गया. इस दिन सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया था कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी का दिन “पूर्ण स्वराज दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. इस दिन सभी स्वतंत्रता सैनानी पूर्ण स्वराज का प्रचार करेंगे. इस तरह 26 जनवरी अघोषित रूप से भारत का स्वतंत्रता दिवस बन गया था.

15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों ने भारत की सत्ता की बागडोर जवाहरलाल नेहरू के हाथों में दे दी, लेकिन भारत का ब्रिटेन के साथ नाता या अंग्रेजों का अधिपत्य समाप्त नहीं हुआ. भारत अभी भी एक ब्रिटिश कॉलोनी की तरह था, जहाँ कि मुद्रा पर ज्योर्ज 6 की तस्वीरें थी.
आज़ादी मिलने के बाद तत्कालीन सरकार ने देश के सँविधान को फिर से परिभाषित करने की जरूरत महसूस की और सविँधान सभा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मिली.

25 नवम्बर 1949 को देश के सँविधान को मंजूरी मिली. 24 जनवरी 1950 को सभी सांसदों और विधायकों ने इस पर हस्ताक्षर किए. और इसके दो दिन बाद यानी 26 जनवरी 1950 को सँविधान लागू कर दिया गया. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने.

इस तरह से 26 जनवरी एक बार फिर सुर्खियों में आ गया. यह एक सयोंग ही था कि कभी भारत का पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन अब भारत का गणतंत्र दिवस बन गया था.

"जय हिंद" - जोशीले नारे की रोचक कहानी

"जय हिंद" - जोशीले नारे की रोचक कहानी 

 

वैसे तो जय हिन्द नारे का सीधा सम्बन्ध नेताजी से है मगर सबसे पहले प्रयोगकर्ता नेताजी सुभाष नहीं थे. आइये देखें यह किसके हृदय में पहले पहल उमड़ा और आम भारतीयों के लिए जय-घोष बन गया.
“जय हिन्द” के नारे की शुरूआत जिनसे होती है उन क्रांतिकारी चेम्बाकरमण पिल्लई का जन्म 15 सितम्बर 1891 को थिरूवनंतपुरम में हुआ था. गुलामी के के आदी हो चुके देशवासियों में आजादी की आकांक्षा के बीज डालने के लिए उन्होने कॉलेज के अभ्यासकाल के दौरान “जय हिन्द” को अभिवादन के रूप में प्रयोग करना शुरू किया.

1908 में पिल्लई आगे के अभ्यास के लिए जर्मनी चले गए.अर्थशास्त्र में पी.एच.डी करने के बाद जर्मनी से ही अंग्रेजो के विरूद्ध क्रांतिकारी गतिविधियाँ शुरू की. प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तो उन्होने जर्मन नौ-सेना में जूनियर अफसर का पद सम्भाला. 22 सितम्बर 1914 के दिन “एम्डेन” नामक जर्मन जहाज से चेन्नई पर बमबारी की. पिल्लई 1933 में आस्ट्रिया की राजधानी वियना में नेताजी सुभाष से मिले तब “जय हिन्द” से उनका अभिवादन किया. पहली बार सुने ये शब्द नेताजी को प्रभावित कर गए.

इधर नेताजी आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना करना चाहते थे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने जिन ब्रिटिश सैनिको को कैद किया था, उनमें भारतीय सैनिक भी थे. 1941 में जर्मन की क़ैदियों की छावणी में नेताजी ने इन्हे सम्बोधित किया तथा अंग्रेजो का पक्ष छोड़ आजाद हिन्द फौज में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया. यह समाचार अखबारों में छपा तो जर्मन में रह रहे भारतीय विद्यार्थी आबिद हुसैन ने अपनी पढ़ाई छोड़ नेताजी के सेक्रेट्री का पद सम्भाल लिया. आजाद हिन्द फौज के सैनिक आपस में अभिवादन किस भारतीय शब्द से करे यह प्रश्न सामने आया तब हुसैन ने”जय हिन्द” का सुझाव दिया. अंतः 2 नवम्बर 1941 को “जय-हिन्द” फौज का युद्धघोष बन गया. जल्दी ही भारत भर में यह गूँजने लगा, मात्र कॉंग्रेस पर तब इसका प्रभाव नहीं था.

1946 में एक चुनाव सभा में जब लोग “कॉग्रेस जिन्दाबाद” के नारे लगा रहे थे, नेहरूजी ने लोगो से “जय हिन्द” का नारा लगाने के लिए कहा. अब तक “वन्दे-मातरम” ही कॉंग्रेस की अहिंसक लड़ाई का नारा रहा था, अब सुभाष बोस की लड़ाई जिसमें हिंसा का विरोध नहीं था के नारे “जय हिन्द” में भेद खत्म हो गया.

15 अगस्त 1947 को नेहरूजी ने लाल किल्ले से अपने पहले भाषण का समापन “जय हिन्द” से किया. तमामjai-hind-new-delhi डाकघरों को सुचना भेजी गई की डाक टिकट चाहे राजा ज्योर्ज की मुखाकृति की उपयोग में आये उस पर मुहर “जय हिन्द” की लगाई जाये. यह 31 दिसम्बर 1947 तक यही मुहर चलती रही. केवल जोधपुर के गिर्दीकोट डाकघर ने इसका उपयोग नवम्बर 1955 तक जारी रखा. आज़ाद भारत की पहली डाक टिकट पर भी “जय हिन्द” लिखा हुआ था.

“जय हिन्द” अमर हो गया मगर क्रांतिकारी चेम्बाकरमण पिल्लई इतिहास में कहीं खो गए. 

10 चीजें जो आप गूगल वेव पर नहीं कर सकते

10 चीजें जो आप गूगल वेव पर नहीं कर सकते 

 

 

गल ने इसे ‘ईमेल कीलर’ कहा है यानी कि एक ऐसा नया माध्यम जिसके आने के बाद ईमेल करना पूरानी फैशन हो जाएगी! यह गूगल वेव है जिसका प्रीव्यू आम लोगों के लिए उपलब्ध है. यदि आप अभी तक गूगल वेव अकाउंट प्राप्त नहीं कर पाएँ हैं तो यहाँ आवेदन कर सकते हैं अथवा अपने किसी जीमेल प्रयोक्ता मित्र के द्वारा आपको निमंत्रित किए जाने तक इंतजार कर सकते हैं.

गूगल वेव एक ऐसी सेवा है जिसके माध्यम से कई लोग एक साथ चैट कर सकते हैं, डोक्यूमेंट साझा कर सकते हैं, एक साथ किसी प्रोजेक्ट पर चर्चा कर सकते हैं तथा अन्य कई कार्य कर सकते हैं.

लेकिन वेव अभी भी अपने परीक्षण काल से गुजर रहा है और इसमें कई कमियाँ पाई गई हैं.उनमें से 10 प्रमुख कमियाँ –

  1. गूगल वेव में कोई प्रयोक्ता कुछ लिखता है तो उस वेव से जुड़े अन्य लोगों को वह दिखता रहता है. यह रीयल टाइम ड्राफ्टिंग बंद नहीं की जा सकती. [गूगल के अनुसार यह फीचर जोड़ा जाएगा]
  2. वेब में लोगों को जोड़ा तो जा सकता है लेकिन निकाला नहीं जा सकता. इसलिए यदि किसी व्यक्ति को भूल से किसी वेव में शामिल कर लिया जाए तो गडबड हो सकती है. [यह फीचर भी जोड़ा जाएगा]
  3. इस समय कोई भी प्रयोक्ता जो किसी वेव से जुड़ा हो वह संदेशों को सम्पादित कर सकता है. “रीड ओनली” वेव विकल्प उलब्ध नहीं है.
  4. वेव में “अन डू (Ctrl+Z)” सुविधा नही है.
  5. लम्बे वेब में से थोड़ा सा हिस्सा निकाल कर अलग थ्रेड शुरू नहीं के जा सकती. [गूगल के अनुसार यह फीचर जोड़ा जाएगा]
  6. दो वेव को एक साथ जोड़ा नहीं जा सकता
  7. वेव पर आप छूपे हुए (इनविजिबल) नहीं रह सकते
  8. वेब पर आप कोंटेक्ट ग्रुप नहीं बना सकते
  9. अपनी वेव से जुड़े किसी सदस्य को आप उस वेव को “पब्लिक” करने से नहीं रोक सकते. इससे गोपनियता भंग होने का खतरा बना रहता है.
  10. आप ढेर सारे वेव को समायोजित नहीं कर सकते.

 

11 अप्रैल, 1954 - एक विचित्र वजह से विशेष

11 अप्रैल, 1954 - एक विचित्र वजह से विशेष 

 

 

11 अप्रैल, 1954 एक विशेष तिथि है. विशेष इसलिए क्योंकि यह वह दिन था जब कुछ भी "विशेष' नहीं हुआ था. शोधकर्ता इसे 20वीं सदी का सबसे "बोरिंग" दिन मान रहे हैं.


इससे पहले  के दिन को सबसे बोरिंग दिन के रूप में चिह्नित किया गया था, क्योंकि उस दिन बीबीसी रेडियो के पास समाचार ही नहीं थे. समाचारवाचक रेडियो पर आया और उसने उद्घोषणा की कि "आज कोई समाचार नहीं है!" परंतु अब शोधकर्ताओं ने 11 अप्रैल, 1954 को सर्वाधिक बोरिंग दिन के रूप में मान्यता दी है.

कैसे तय किया गया यह दिन -
हर दिन कोई ना कोई घटना होती ही रहती है. परंतु माना गया है कि 1954 के अप्रैल महिने की 11 तारिख को कुछ भी विशेष नहीं हुआ था. शोधकर्ताओं ने इसके लिए 30 करोड महत्वपूर्ण घटनाओं को एक विशेष कम्प्यूटर शोध प्रोग्राम "ट्रु नोलेज" में डाला और गणनाएँ की.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वीलियम टनस्टाल के द्वारा विकसित इस सोफ्टवेर ने पता लगाया कि 11 अप्रैल, 1954 को 2-3 छोटी मोटी घटनाओं को छोडकर कुछ भी विशेष नहीं हुआ. इस दिन बैल्जियम में चुनाव हुए थे, तुर्की के एक बुद्धिजीवी का जन्म हुआ था और जैक शफलबोटम नामक फूटबॉल खिलाडी का निधन हुआ था. इसके अलावा इस दिन कुछ नहीं हुआ.

तो याद रखिए अगली बार जब 11 अप्रैल आए तो वह दिन सबसे बोरिंग दिन